Tuesday, 4 December 2012

GURU


गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय ॥ 4 ॥
बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार ।
मानुष से देवत किया करत न लागी बार ॥ 5 ॥

जाका गुरु है गीरही, गिरही चेला होय ।
कीच-कीच के धोवते, दाग न छूटे कोय ॥ 501 ॥
गुरु मिला तब जानिये, मिटै मोह तन ताप ।
हरष शोष व्यापे नहीं, तब गुरु आपे आप ॥ 502 ॥

यह तन विषय की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान ॥ 503 ॥


बँधे को बँधा मिला, छूटै कौन उपाय ।
कर सेवा निरबन्ध की पल में लेय छुड़ाय ॥ 504 ॥

गुरु बिचारा क्या करै, शब्द न लागै अंग ।
कहैं कबीर मैक्ली गजी, कैसे लागू रंग ॥ 505 ॥

गुरु बिचारा क्या करे, ह्रदय भया कठोर ।
नौ नेजा पानी चढ़ा पथर न भीजी कोर ॥ 506 ॥

कहता हूँ कहि जात हूँ, देता हूँ हेला ।
गुरु की करनी गुरु जाने चेला की चेला ॥ 507 ॥

॥ गुरु शिष्य के विषय मे दोहे ॥


शिष्य पुजै आपना, गुरु पूजै सब साध ।
कहैं कबीर गुरु शीष को, मत है अगम अगाध ॥ 508 ॥

हिरदे ज्ञान न उपजै, मन परतीत न होय ।
ताके सद्गुरु कहा करें, घनघसि कुल्हरन होय ॥ 509 ॥

ऐसा कोई न मिला, जासू कहूँ निसंक ।
जासो हिरदा की कहूँ, सो फिर मारे डंक ॥ 510 ॥

शिष किरपिन गुरु स्वारथी, किले योग यह आय ।
कीच-कीच के दाग को, कैसे सके छुड़ाय ॥ 511 ॥

स्वामी सेवक होय के, मनही में मिलि जाय ।
चतुराई रीझै नहीं, रहिये मन के माय ॥ 512 ॥
गुरु कीजिए जानि के, पानी पीजै छानि ।
बिना विचारे गुरु करे, परे चौरासी खानि ॥ 513 ॥


सत को खोजत मैं फिरूँ, सतिया न मिलै न कोय ।
जब सत को सतिया मिले, विष तजि अमृत होय ॥ 514 ॥

देश-देशान्तर मैं फिरूँ, मानुष बड़ा सुकाल ।
जा देखै सुख उपजै, वाका पड़ा दुकाल ॥ 515 ॥

गुरु आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल ।
लोक वेद दोनों गये, आये सिर पर काल ॥ 704 ॥

उलटे सुलटे बचन के शीष न मानै दुख ।
कहैं कबीर संसार में, सो कहिये गुरुमुख ॥ 707 ॥

कहैं कबीर गुरु प्रेम बस, क्या नियरै क्या दूर ।
जाका चित जासों बसै सौ तेहि सदा हजूर ॥ 708 ॥

गुरु आज्ञा लै आवही, गुरु आज्ञा लै जाय ।
कहैं कबीर सो सन्त प्रिय, बहु विधि अमृत पाय ॥ 709 ॥

गुरुमुख गुरु चितवत रहे, जैसे मणिहि भुजंग ।
कहैं कबीर बिसरे नहीं, यह गुरु मुख के अंग ॥ 710 ॥

यह सब तच्छन चितधरे, अप लच्छन सब त्याग ।
सावधान सम ध्यान है, गुरु चरनन में लाग ॥ 711 ॥

कबीर गुरु कै भावते, दूरहि ते दीसन्त ।
तन छीना मन अनमना, जग से रूठि फिरन्त ॥ 715 ॥
कबीर गुरु सबको चहै, गुरु को चहै न कोय ।
जब लग आश शरीर की, तब लग दास न होय ॥ 716 ॥
गुरुपादुका स्तवन
अनन्तसंसारसमुद्रतार नौकायिताभ्यां गुरुभक्तिदाभ्याम् ।
वैराग्यसाम्राज्यदपृजनाभ्याम् नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥१॥
कवित्ववाराशिनिशाकराभ्यां दौर्भाग्यदावाम्बुदमालिकाभ्याम् ।
दूरिकृतानम्रविपत्ततिभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥२॥ 
नना ययोः श्रीपतितां समीयुः कदाचिदप्याशु दरिद्रवर्याः ।
मृकाश्च वाचस्पतितां हि ताभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥३॥
नालीकनीकाशपदाह्रताभ्यां नानाविमोहादि निवारिकाभ्याम् ।
नमज्जनाभीष्टततिप्रदाभ्या नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥४॥
नृपालिमौलिव्रजरत्नकान्ति सरिद्विराजत् झषकन्यकाभ्याम् ।
नृपत्वदाभ्यां नतलोकपङ्कतेः नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥५॥
पापान्धकारार्क परमपराभ्यां तापत्रयाहीन्द्रखगेश्वराभ्याम् ।
जाड्याब्धिसंशोषणवाडवाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥६॥
पापान्धकारार्क परमपराभ्यां तापत्रयाहीन्द्रखगेश्वराभ्याम् ।
जाड्याब्धिसंशोषणवाडवाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥६॥
स्वार्चापराणामखिलेष्टदाभ्यां स्वाहासहायाक्षधुरन्धराभ्याम् ।
स्वान्ता च्छभावप्रदपृजनाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥८॥
कामादिसर्पव्रजगारुडाभ्यां विवेकवैराग्यनिधिप्रदाभ्याम् ।
बोधप्रदाभ्यां द्रुतमोक्षदाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥९॥
गुरु समरथ सिर पर खड़े, कहा कभी तोहि दास ।
रिद्धि-सिद्धि सेवा करै, मुक्ति न छोड़े पास ॥ 718 ॥

तेहि घर किसका चांदना, जिहि घर सतगुरु नाहिं।
महात्मा कबीरदास जी कहते हैं कि चौसठ कलाओं और चौदह विद्याओं की जानकारी होने पर पर अगर सत्गुरु का ज्ञान नहीं है तो समझ लीजिये अंधियारे में ही रह रहे हैं।
कबीर गुरु की भक्ति बिन, राज ससभ होय।
माटी लदै कुम्हार की, घास न डारै कोय।।
महात्मा कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु की भक्ति के बिना राजा भी गधा होता है जिस पर कुम्हार दिन भर मिट्टी लादेगा और कोई घास भी नहीं डालेगा।

1.   गुरु की आवश्यकता क्यों ?

यूँ तो प्रत्येक ज्ञान में गुरु की अनिवार्य उपयोगिता है परंतु ब्रह्मज्ञान के लिए तो दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है। गुरु के बिना उपासना-मार्ग के रहस्य मालूम नहीं होते और न उसकी अड़चनें दूर होती है। जो उपासना करना चाहता है, वह गुरु के बिना एक पग भी नहीं बढ़ सकता। गुरु के संतोष में ही शिष्य की पूर्णता है। एक दृष्टांत कहता हूँ – मेरे बचपन का एक मित्र था। हम दोनों वर्षों से मिले नहीं किंतु पत्र-व्यवहार चलता था। एक बार मैं उसके घर गया पर उसने पहचाना नहीं। मैंने अपना नाम नहीं बताया और उसके साथ खुला व्यवहार करने लगा। वह तो हैरान हो गया। इतने में किसी ने मेरा नाम ले दिया तो आकर गले से लिपट गया। अब देखो कि मैं उसके सामने प्रत्यक्ष था परंतु नेत्रों के सामने होना एक बात है और पहचानना दूसरी वस्तु है। हमारा आत्मा जो ब्रह्म है, हमसे कहीं दूर नहीं है। सदा सोते-जागते, उठते-बैठते अपने साथ है। यह नित्य प्राप्त है। इसमें वियोग की सम्भावना नहीं है। परंतु ऐसे नित्य प्राप्त आत्मा को हम पहचान नहीं रहे हैं। यदि इसमें स्थित होने से इसकी पहचान होती तो सुषुप्ति में, समाधि में हो जाती। पास रहते हम इसे पहचान नहीं रहे हैं तो बताने वाले की आवश्यकता है। जब तक कोई बतायेगा नहीं कि 'वह ब्रह्म तो तू ही है' तब तक उसका ज्ञान नहीं होगा। उस ब्रह्म को आत्मरूप से जानने के लिए साधन-सम्पन्न जिज्ञासु हाथ में समिधा लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ सदगुरु की शरण में जाय।

धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद् भवः। धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।
'जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेनेवाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।'


1.   छत्रपति शिवाजी महाराज की अनूठी गुरु-सेवा

"भाई ! तुझे नहीं लगता कि गुरुदेव हम सबसे ज्यादा शिवाजी को चाहते हैं? शिवाजी के कारण हमारे प्रति उनका यह पक्षपात मेरे अंतर में शूल की नाई चुभ रहा है।" समर्थ रामदास स्वामी का एक शिष्य दूसरे शिष्य से इस तरह की गुफ्तगू कर रहा था। "हाँ, बंधु ! तेरी बात शत-प्रतिशत सही है। शिवाजी राजा है, छत्रपति हैं इसीलिए समर्थ हम सबसे ज्यादा उन पर प्रेम बरसाते हैं। इसमें हमको कुछ गलत नहीं लगना चाहिए।" शिष्य तो इस तरह की बातें करके अपने-अपने काम में लग गये, लेकिन इन दोनों का यह वार्तालाप अनायास ही समर्थ रामदास स्वामी के कानों में पड़ गया था। समर्थ ने सोचा कि 'उपदेश से काम नहीं चलेगा, इनको प्रयोगसहित समझाना पड़ेगा।'
एक दिन समर्थ ने लीला की। वे शिष्यों को साथ लेकर जंगल में घूमने गये। चलते-चलते समर्थ पूर्वनियोजन के अनुसार राह भूलकर घोर जंगल में इधर-उधर भटकने लगे। सब जंगल से बाहर निकलने का रास्ता ढूँढ रहे थे, तभी अचानक समर्थ को उदर-शूल उठा। पीड़ा असह्य होने से उन्होंने शिष्यों को आस-पास में कोई आश्रय-स्थान ढूँढने को कहा। ढूँढने पर थोड़ी दूरी पर एक गुफा मिला गयी। शिष्यों के कन्धों के सहारे चलते हुए किसी तरह समर्थ उस गुफा तक पहुँच गये। गुफा में प्रवेश करते ही वे जमीन पर लेट गये एवं पीड़ा से कराहने लगे। शिष्य उनकी पीड़ा मिटाने का उपाय खोजने की उलझन में खोयी-सी स्थिति में उनकी सेवा-शुश्रूषा करने लगे। सभी ने मिलकर गुरुदेव से इस पीड़ा का इलाज पूछा। समर्थ ने कहाः "इस रोग की एक ही औषधि है – बाघनी का दूध ! लेकिन उसे लाना माने मौत को निमंत्रण देना !" अब उदर शूल मिटाने के लिए बाघनी का दूध कहाँ से लायें और लाये कौन? सब एक दूसरे का मुँह ताकते हुए सिर पकड़कर बैठ गये। उसी समय शिवाजी को अपने गुरुदेव के दर्शन करने की इच्छा हुई। आश्रम पहुँचने पर उन्हें पता चला कि गुरुदेव तो शिष्यों को साथ लेकर बहुत देर से जंगल में गये हैं। गुरुदर्शन के लिए शिवाजी का तड़प तीव्र हो उठी। अंततः शिवाजी ने समर्थ के दर्शन होने तक बिना अन्न-जल के रहने का निश्चय किया और उनकी तलाश में सैनिकों की एक टोली के साथ जंगल की ओर चल पड़े।
खोजते-खोजते शाम हो गयी किंतु उन्हें समर्थ के दर्शन नहीं हुए। देखते-ही-देखते अँधेरा छा गया। जंगली जानवरों की डरावनी आवाजें सुनायी पड़ने लगीं, फिर भी शिवाजी 'गुरुदेव! गुरुदेव!!' ऐसा पुकारते हुए आगे बढ़ते गये। अब तो सैनिक भी मन-ही-मन खिन्न हो गये परंतु शिवाजी की गुरु-मिलन की व्याकुलता के आगे वे कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं कर सके। आखिर सैनिक भी पीछे रह गये परंतु शिवा को इस बात की चिंता नहीं थी, उन्हें तो गुरुदर्शन की तड़प थी। घोड़े पर सवार शिवा में हाथ में मशाल लिये आगे बढ़ते ही रहे। मध्यरात्रि हो गयी। कृष्णपक्ष की अँधेरी रात्रि में जंगली जानवरों के चलने फिरने की आवाज सुनायी पड़ने लगी। इतने में शिवाजी ने बाघ की दहाड़ सुनी। वे रुक गये। कुछ समय तक जंगल में दहाड़ की प्रतिध्वनि गूँजती रही और फिर सन्नाटा छा गया। इतने में एक करुण स्वर वन में गूँजाः 'अरे भगवान ! हे रामरायाऽऽऽ.... मुझे इस पीड़ा से बचाओ।' 'यह क्या ! यह तो गुरु समर्थ की वाणी है ! शिवाजी आवाज तो पहचान गये, परंतु सोच में पड़ गये कि 'समर्थ जैसे महापुरुष ऐसा करुण क्रंदन कैसे कर सकते हैं? वे तो शरीर के सम्बन्ध से पार पहुँचे हुए समर्थ योगी हैं।'
शिवाजी को संशय ने घेर लिया। इतने में फिर उसी ध्वनि का पुनरावर्तन हुआ। शिवाजी ने ध्यानपूर्वक सुना तो पता चला कि वे जिस पहाड़ी के नीचे हैं, उसी के शिखर से यह करुण ध्वनि आ रही है। पहाड़ी पर चढ़ने के लिए कहीं से भी कोई रास्ता न दिखा। शिवाजी घोड़े से उतरे और अपनी तलवार से कँटीली झाड़ियों को काटकर रास्ता बनाते हुए आखिर गुफा तक पहुँच ही गये। शिवाजी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ, जब उन्होंने समर्थ की पीड़ा से कराहते और लोट-पोट होते देखा। शिवा की आँखें आँसुओं से छलक उठीं। वे मशाल को एक तरफ रखकर समर्थ के चरणों में गिर पड़े। समर्थ के शरीर को सहलाते हुए शिवाजी ने पूछाः "गुरुदेव ! आपको यह कैसी पीड़ा हो रही है? आप इस घने जंगल में कैसे? गुरुदेव ! कृपा करके बताइये।" समर्थ कराहते हुए बोलेः "शिवा ! तू आ गया? मेरे पेट में जैसे शूल चुभ रहे हों ऐसी असह्य वेदना हो रही है रे..." "गुरुदेव ! आपको तो धन्वंतरि महाराज भी हाजरा-हजूर हैं। अतः आप इस उदर शूल की औषधि तो जानते ही होंगे। मुझे औषधि का नाम कहिये। शिवा आकाश-पाताल एक करके भी वह औषधि ले आयेगा।"
"शिवा ! यह तो असाध्य रोग है। इसकी कोई औषधि नहीं है। हाँ, एक औषधि से राहत जरूर मिल सकती है लेकिन जाने दे। इस बीमारी का एक ही इलाज है और वह भी अति दुर्लभ है। मैं उस दवा के लिए ही यहाँ आया था, लेकिन अब तो चला भी नहीं जाता.... दर्द बढ़ता ही जा रहा है..."
शिवा को अपने-आपसे ग्लानि होने लगी कि 'गुरुदेव लम्बे समय से ऐसी पीड़ा सहन कर रहे हैं और मैं राजमहल में बैठा था। धिक्कार है मुझे ! धिक्कार है !!' अब शिवा से रहा न गया। उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहाः "नहीं गुरुदेव ! शिवा आपकी यातना नहीं देख सकता। आपको स्वस्थ किये बिना मेरी अंतरात्मा शांति से नहीं बैठेगी। मन में जरा भी संकोच रखे बिना मुझे इस रोग की औषधि के बारे में बतायें। गुरुदेव ! मैं लेकर आता हूँ वह दवा।" समर्थ ने कहाः "शिवा ! इस रोग की एक ही औषधि है – बाघनी का दूध ! लेकिन उसे लाना माने मौत का निमंत्रण देना है। शिवा ! हम तो ठहरे अरण्यवासी। आज यहाँ कल वहाँ होंगे, कुछ पता नहीं। परंतु तुम तो राजा हो। लाख गये तो चलेगा, परंतु लाखों का रक्षक जिन्दा रहना चाहिए।"
"गुरुदेव ! जिनकी कृपादृष्टि मात्र से हजारों शिवा तैयार हो सकते हैं, ऐसे समर्थ सदगुरु की सेवा में एक शिवा की कुर्बानी हो भी जाये तो कोई बात नहीं। मुगलों के साथ लड़ते-लड़ते मौत के साथ सदैव जूझता आया हूँ, गुरुसेवा करते-करते मौत आ जायेगी तो मृत्यु भी महोत्सव बन जायेगी। गुरुदेव आपने ही तो सिखाया है कि आत्मा कभी मरती नहीं और नश्वर देह को एक दिन जला ही देना है। ऐसी देह का मोह कैसा? गुरुदेव ! मैं अभी बाघनी का दूध लेकर आता हूँ।"
'क्या होगा? कैसे मिलेगा?' अथवा 'ला सकूँगा या नहीं?' – ऐसा  सोचे बिना शिवाजी गुरु को प्रणाम करके पास में पड़ा हुआ कमंडलु लेकर चल पड़े। सतशिष्य की कसौटी करने के लिए प्रकृति ने भी मानों, कमर कसी और आँधी-तुफान के साथ जोरदार बारिश शुरु हुई। बरसते पानी में शिवाजी दृढ़ विश्वास के साथ चल पड़े बाघनी को ढूँढने। लेकिन क्या यह इतना आसान था? मौत के पंजे में प्रवेश कर वहाँ से वापस आना कैसे संभव हो सकता है? परंतु शिवाजी को तो गुरुसेवा की धुन लगी थी। उन्हें इन सब बातों से क्या लेना-देना? प्रतिकूल संयोगों का सामना करते हुए नरवीर शिवाजी आगे बढ़ रहे थे। जंगल में बहुत दूर जाने पर शिवा को अँधेरे में चमकती हुई चार आँखें दिखीं। शिवा उनकी ओर आगे बढ़ने लगे। उनको अपना लक्ष्य दिख गया। वे समझ गये कि ये बाघनी के बच्चे हैं, अतः बाघनी भी कहीं पास में ही होगी। शिवाजी प्रसन्न थे। मौत के पास जाने में प्रसन्न ! एक सतशिष्य के लिए उसके सदगुरु की प्रसन्नता से बड़ी चीज संसार में और क्या हो सकती है? इसलिए शिवाजी प्रसन्न थे।
शिवाजी के कदमों की आवाज सुनकर बाघनी के बच्चों ने समझा कि उनकी माँ है, परंतु शिवाजी को अपने बच्चों के पास चुपके-चुपके जाते देखकर पास में बैठी बाघनी क्रोधित हो उठी। उसने शिवाजी पर छलाँग लगायी परंतु कुशल योद्धा शिवाजी ने अपने को बाघनी के पंजे से बचा लिया। फिर भी उनकी गर्दन पर बाघनी के दाँत अपना निशान छोड़ चुके थे। परिस्थितियाँ विपरीत थीं। बाघनी क्रोध से जल रही थी। उसका रोम-रोम शिवा के रक्त का प्यासा बना हुआ था, परंतु शिवा का निश्चय अटल था। वे अब भी हार मानने को तैयार नहीं थे, क्योंकि समर्थ सदगुरु के सतशिष्य जो ठहरे !
शिवाजी बाघनी से प्रार्थना करने लगे कि 'हे माता ! मैं तेरे बच्चों का अथवा तेरा कुछ बिगाड़ने नहीं आया हूँ। मेरे गुरुदेव को रहे उदर-शूल में तेरा दूध ही एकमात्र इलाज है। मेरे लिए गुरुसेवा से बढ़कर इस संसार में दूसरी कोई वस्तु नहीं। हे माता ! मुझे मेरे सदगुरु की सेवा करने दे। तेरा दूध दुहने दे।' पशु भी प्रेम की भाषा समझते हैं। शिवाजी की प्रार्थना से एक महान आश्चर्य घटित हुआ – शिवाजी के रक्त की प्यासी बाघनी उनके आगे गौमाता बन गयी ! शिवाजी ने बाघनी के शरीर पर प्रेमपूर्वक हाथ फेरा और अवसर पाकर वे उसका दूध निकालने लगे। शिवाजी की प्रेमपूर्वक प्रार्थना का कितना प्रभाव ! दूध लेकर शिवा गुफा में आये।
समर्थ ने कहाः "आखिर तू बाघनी का दूध भी ले आया, शिवा ! जिसका शिष्य गुरुसेवा में अपने जीवन की बाजी लगा दे, प्राणों को हथेली पर रखकर मौत से जूझे, उसके गुरु को उदर-शूल कैसे रह सकता है? मेरा उदर-शूल तो जब तू बाघनी का दूध लेने गया, तभी अपने-आप शांत हो गया था। शिवा तू धन्य है ! धन्य है तेरी गुरुभक्ति ! तेरे जैसा एकनिष्ठ शिष्य पाकर मैं गौरव का अनुभव करता हूँ।" ऐसा कहकर समर्थ ने शिवाजी के प्रति ईर्ष्या रखनेवाले उन दो शिष्यों के सामने अर्थपूर्ण दृष्टि से देखा। 'गुरुदेव शिवाजी को अधिक क्यों चाहते हैं?' – इसका रहस्य उनको समझ में आ गया। उनको इस बात की प्रतीति कराने के लिए ही गुरुदेव ने उदर-शूल की लीला की थी, इसका उन्हें ज्ञान हो गया।
अपने सदगुरु की प्रसन्नता के लिए अपने प्राणों तक बलिदान करने का सामर्थ्य रखनेवाले शिवाजी धन्य हैं ! धन्य हैं ऐसे सतशिष्य ! जो सदगुरु के हृदय में अपना स्थान बनाकर अमर पद प्राप्त कर लेते हैं.... धन्य है भारतमाता ! जहाँ ऐसे सदगुरु और सतशिष्य पाये जाते हैं।

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